“तरंग संचार” वेब पोर्टल

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दूरसंचार मंत्री मनोज सिन्हा ने दूरसंचार विभाग (Department of Telecom – DoT) द्वारा तैयार किए गए उस वेब पोर्टल को लाँच किया जिसकी मदद से मोबाइल उपभोक्ता अपने क्षेत्र में स्थित मोबाइल टॉवरों द्वारा छोड़ी जाने वाली तरंगों में मौजूद विकिरण की मात्रा का परा लगा सकेंगे। ग्राहक माउस के एक बटन की क्लिक से यह जान सकेंगे कि उनके क्षेत्र में मोबाइल टॉवरों से होने वाली विकिरण की मात्रा केन्द्र सरकार द्वारा तय इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षेत्र के उत्सर्जन मानकों (electromagnetic field (EMF) emission norms) की परिधि में आता है अथवा नहीं। इसके अलावा “तरंग संचार” से मोबाइल विकिरण से सम्बन्धित तमाम मिथकों के टूटने की संभावना भी है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनो ही ग्वालियर के एक 42 वर्षीय मरीज की मांग पर उसके इलाके से मोबाइल टावर हटाने का आदेश दिया था। मरीज का दावा था कि मोबाइल टावर से निकलने वाली घातक तरंगों के कारण ही उसे कैंसर हुआ है। कोर्ट के इस आदेश के बाद मोबाइल टावरों से उत्सर्जित होने वाले विकिरण को लेकर जारी बहस नए सिरे से तेज हो गई थी। हालांकि सरकार का कहना है कि भारतीय मोबाइल टावर पूरी तरह सुरक्षित हैं। क्योंकि सरकार ने इन पर विकिरण उत्सर्जन के इतने सख्त मानक लागू कर रखे हैं जितने विकसित देशों में भी नहीं हैं।

दुनिया की पहली क्वांटम कम्प्यूटिंग मशीन

SARTHAK IAS LUCKNOW

चीनी वैज्ञानिकों ने दुनिया की पहली क्वांटम कम्प्यूटिंग मशीन का निर्माण किया है जो कि प्रारंभिक पारंपरिक या शास्त्रीय कंप्यूटर से परे है, क्वांटम कंप्यूटिंग की प्राप्ति के लिए मार्ग बना रहा है। वैज्ञानिकों ने चीन के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के उन्नत अध्ययन संस्थान शंघाई में अपनी उपलब्धि की घोषणा की। उनका मानना ​​है कि क्वांटम कंप्यूटिंग कुछ मायनों में सुपर कंप्यूटरों की प्रोसेसिंग पावर कम कर सकती है। क्वांटम कंप्यूटिंग की अवधारणा को समझाने के लिए एक समानता यह है कि एक पुस्तकालय में सभी पुस्तकों को एक ही समय में पढ़ने में सक्षम होने की तरह है, जबकि पारंपरिक कंप्यूटिंग की तरह उन्हें एक के बाद एक पढ़ने की तरह है चीनी विज्ञान अकादमी और एक प्रमुख क्वांटम भौतिकविद् के एक अकादमी के पैन जियानवी, ने कहा कि क्वांटम कंप्यूटिंग अल्ट्रा फास्ट समांतर गणना और सिमुलेशन क्षमताओं को सक्षम करने के लिए मौलिक क्वांटम सुपरपोज़ेशन सिद्धांत का लाभ उठाती है। सामान्य सिलिकॉन कंप्यूटर चिप्स में, डेटा दो से एक में प्रदान किया जाता है: 0 या 1. हालांकि, क्वांटम कंप्यूटर में, डेटा एक साथ दोनों स्थिति में मौजूद हो सकता हैं, अधिक तीव्रता से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। एक क्वांटम कंप्यूटर की कम्प्यूटिंग पावर क्वांटम बिट्स की संख्या के साथ तेजी से बढ़ती है यह प्रभावी रूप से बड़े पैमाने पर गणना की समस्याओं को हल कर सकता है जो वर्तमान कंप्यूटर की क्षमता से परे हैं, पैन ने कहा। क्वांटम कंप्यूटिंग की विशाल क्षमता के कारण, यूरोप और अमेरिका सक्रिय रूप से अपने शोध में सहयोग कर रहे हैं। उच्च तकनीक कंपनियों, जैसे कि Google, माइक्रोसॉफ्ट और आईबीएम, क्वांटम कम्प्यूटिंग अनुसंधान में भी बड़े पैमाने पर रुचि रखते हैं। शोध दल तीन तकनीकी मार्गों की खोज कर रहा है: एकल फोटॉन, अति-ठंड परमाणुओं और सुपरकंडक्टिंग सर्किट पर आधारित सिस्टम। मल्टी-कण क्वांटम कंप्यूटिंग तकनीक का मूल है और क्वांटम कंप्यूटिंग अनुसंधान में अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता का फ़ोकस रहा है। फोटोनिक प्रणाली में, उनकी टीम ने दुनिया में पहले 5, 6, 8 और 10 उलटे फोटान हासिल किए हैं और विकास के मामले में सबसे आगे हैं।

फार्मास्यूटिकल्स विभाग (डीओपी) ने एक उच्च स्तरीय समिति की स्थापना की

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फार्मास्यूटिकल्स विभाग (डीओपी) ने एक उच्च स्तरीय समिति की स्थापना की है जिसमें विशेषज्ञों को मूल्य-निर्धारण और नई दवाओं के लांच करने के लिए समयबद्ध तरीके से मुद्दों को सुलझाने में सहायता करने के लिए सहायता मिलती है।
समिति, जिसमें भारत के मूल्य निर्धारण नियामक, राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) के विशेषज्ञ शामिल हैं, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग, ड्रग रेगुलेटर के कार्यालय से प्रतिनिधि केंद्रीय ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (सीडीएससीओ) के बीच, दूसरों, उद्योग और सरकार के बीच के मुद्दों पर काम करेंगे।
"ड्रग्स (कीमतें नियंत्रण) आदेश 2013 के कार्यान्वयन से प्राप्त अनुभव को ध्यान में रखते हुए, मूल्य निर्धारण से संबंधित सभी तकनीकी मुद्दों पर परामर्श करने के लिए विशेषज्ञों की एक एकल बहु-अनुशासनात्मक समिति का गठन करने का निर्णय लिया गया है, जहां नई स्पष्टता स्पष्ट है आवश्यक हो सकता है और एनपीपीए द्वारा अपने कार्यों के निर्वहन पर निर्दिष्ट मामलों पर निर्णय लेना चाहिए. दो मौजूदा विशेषज्ञ समितियां हैं - एक स्थायी समिति जिसकी भूमिका नई दवा लांच करने के लिए प्रतिबंधित है और कीमत नियंत्रण को लागू करने के बारे में निर्णय लेती है; और विशेषज्ञों की एक अन्य समिति जो पैकेजिंग और नवाचार से संबंधित मुद्दों का मूल्यांकन करती है।

अमेरिकी सुरक्षा की नयी रणनीति

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जारी नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति बताती है कि दुनिया एक स्थाई आर्थिक प्रतिस्पद्र्धा में घिरी हुई है, जिसमें वाशिंगटन की भूमिका विदेशों में लोकतंत्र को बढ़ावा देने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका अब बड़ी ताकतों की होड़, आर्थिक प्रतिस्पद्र्धा और घरेलू सुरक्षा पर भी पर्याप्त ध्यान देगा। ट्रंप के मुताबिक, उदारवादी नीतियों के रूप में पूर्व में जो गलत कदम उठाए गए थे, उसका इतिहास अब औपचारिक रूप से खत्म हो गया है। ये नीतियां शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से अमेरिकी विदेश नीति को दिशा दे रही थीं।
ट्रंप प्रशासन ने इस नई सुरक्षा रणनीति को एक ऐसा दस्तावेज बताया है, जो ‘कड़ी-प्रतिस्पद्र्धी दुनिया’ में ‘सैद्धांतिक यथार्थवाद’ पर आधारित है। यह रणनीति दुनिया की बड़ी ताकतों की राजनीति पर केंद्रित है और रूस व चीन को ऐसी ‘संशोधनवादी शक्तियां’ मानती है, जो वैश्विक यथास्थिति को बदलने की इच्छुक हैं और प्रतिस्पद्र्धा में पक्ष में किसी तरह के सहयोग को नकारते हुए एक अप्रिय दुनिया की छवि गढ़ती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे और स्पष्ट करते हुए बताया कि ‘चीन व रूस अमेरिकी ताकत, प्रभाव व हितों को चुनौती देते हैं, और अमेरिकी सुरक्षा व समृद्धि को नष्ट करने की कोशिश करते हैं’। इसीलिए अमेरिका ने ‘पिछले दो दशक की अपनी नीतियों की समीक्षा की है। वे नीतियां असल में इस धारणा पर आधारित थीं कि विरोधियों को साथ लेकर चलने और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं व वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी सुनिश्चित किए जाने से वे भरोसेमंद दोस्त बन जाएंगे।’ नया दस्तावेज बताता है कि ‘कई मामलों में यह धारणा गलत साबित हुई है’। जाहिर है, यह दो बड़ी शक्तियों पर असाधारण हमला है। ट्रंप बताते हैं कि रूस और चीन ‘अर्थव्यवस्था को अपेक्षाकृत कम मुक्त करने व कम निष्पक्ष बनाने के हिमायती हैं। वे अपनी सेना के विस्तार, अपने समाजों के दमन के लिए सूचना व डाटा पर नियंत्रण रखने और अपना प्रभाव बढ़ाने के भी पक्षधर हैं’। अमेरिकी राष्ट्रपति का दावा है कि चीन और रूस ‘उन्नत हथियार व सैन्य क्षमता’ विकसित कर रहे हैं, जो अमेरिका के ‘महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और नियंत्रण रखने वाली संरचनाओं’ के लिए खतरा बन सकती है। दस्तावेज की मानें, तो अमेरिका अब खुलकर यह मान रहा है कि ‘दुनिया भर में सशक्त सैन्य, आर्थिक व राजनीतिक प्रतिस्पद्र्धा चल रही है’ और ट्रंप प्रशासन ‘इस चुनौती से पार पाने, अमेरिकी हितों की रक्षा करने और अमेरिकी मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए अपने प्रतिस्पद्र्धात्मक कदमों को तेज करने’ का इरादा रखता है। राष्ट्रपति टं्रप के ही शब्दों में कहें, तो ‘हम इतनी मजबूती से खडे़ होंगे, जैसे पहले कभी नहीं खडे़ हुए हैं’। साफ है, दुनिया में लोकतंत्र को बढ़ावा देने संबंधी नीति को, जो पारंपरिक रूप से अमेरिकी विदेश नीति की आधारशिला रही है, अब नजरअंदाज किया जा रहा है और ट्रंप की ‘अमेरिका फस्र्ट’ संबंधी सोच यही संभावना जगाती है कि अमेरिका ‘दुनिया भर में उचित व पारस्परिक आर्थिक संबंधों की वकालत करेगा’। जाहिर है, आने वाले हफ्तों में चीन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। उसके खिलाफ बौद्धिक संपदा चोरी करने संबंधी मामलों और जबरिया प्रौद्योगिकी हस्तांतरण संबंधी नीतियों की जांच पूरी होने वाली है। ऐसे में, ट्रंप प्रशासन चीन से आने वाले उत्पादों पर नया दंडात्मक सीमा-शुल्क लगा सकता है। इस सुरक्षा दस्तावेज में अमेरिका की बौद्धिक संपदा के महत्व पर पहली बार जोर दिया गया है। इसमें ‘नेशनल सिक्योरिटी इनोवेशन बेस’ की बात कही गई है, जिसमें शिक्षा या शिक्षा संबंधी शोध से लेकर तकनीकी कंपनियों तक, सभी को शामिल किया गया है। ट्रंप की नई सुरक्षा रणनीति स्पष्ट करती है कि ‘रचनात्मक अमेरिकियों की बौद्धिकता और उन्हें सक्षम बनाने वाली स्वतंत्र प्रणाली अमेरिकी सुरक्षा व समृद्धि के लिए काफी मायने रखती है’।
जलवायु परिवर्तन को राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के लिए भार मानते हुए उसे झटक दिया गया है। इसकी अपेक्षा जून में पेरिस समझौता से अमेरिका के बाहर निकालने संबंधी ट्रंप की घोषणा के बाद से ही की जा रही थी। ऐसा इस सच के बावजूद किया गया है कि ट्रंप ने 2018 में रक्षा पर होने वाले खर्च को लेकर जिस बिल पर हस्ताक्षर किए, उसमें कहा गया है कि ‘अमेरिका की सुरक्षा के लिए जलवायु परिवर्तन एक बड़ा व सीधा खतरा है’।

भारत की कूटनीति

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• कूटनीति में एक पुराना सिद्धांत है, जब दुनिया में अनिश्चितता बढ़ रही हो तो सबसे पहले अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करो। क्या भारत भी कुछ ऐसी ही अनिश्चितताओं को देख रहा है? तभी उसने अपनी ऊर्जा कूटनीति पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। खाड़ी क्षेत्र के पांच देशों के दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्र में ऊर्जा सुरक्षा एक अहम एजेंडा था।
• अब अगले कुछ हफ्तों के दौरान अमेरिका के ऊर्जा सचिव रिक पेरी, ईरान के राष्ट्रपति रोहानी और सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरामको के मुखिया भारत दौरे पर आ रहे हैं। इन तीनों के साथ होने वाली बातचीत सीधे तौर पर देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी होगी।
• पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेद्र प्रधान के मुताबिक, ‘अभी ऊर्जा सुरक्षा के लिए अगला कुछ हफ्ता काफी व्यस्त रहेगा। ईरान के राष्ट्रपति के साथ फरजान-बी ब्लॉक, गैस पाइपलाइन समेत सभी मुद्दों पर बात होगी। उसी तरह से अमेरिका के ऊर्जा सचिव के साथ काफी व्यापक एजेंडा है।’
• प्रधान का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी के दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ व्यक्तिगत रिश्तों का असर भी ऊर्जा क्षेत्र पर दिख रहा है। मसलन, दो दिन पहले अबूधाबी नेशनल ऑयल कंपनी के तेल ब्लॉक में 10 फीसद हिस्सेदारी को लेकर जो समझौता हुआ है वह मोदी और क्राउन प्रिंस मोहम्मद अल नेहयान के बीच प्रगाढ़ होते रिश्तों का ही परिणाम है। अभी तक भारतीय कंपनियों को खाड़ी के किसी भी देश के तेल ब्लॉक में हिस्सेदारी नहीं मिली थी।
• पेट्रोलियम मंत्रलय के सूत्रों के मुताबिक, ईरान के राष्ट्रपति हसन रोहानी के साथ होने वाली बातचीत से उम्मीद की जानी चाहिए। हाल के वर्षो में तेल एवं गैस क्षेत्र में आपसी रिश्तों में जो तनाव पैदा हुआ है वह खत्म हो जाएगा। भारत ने पिछले वर्ष ईरान से तेल खरीदने में काफी कटौती कर थी। इस पर ईरान ने ऐतराज जताते हुए भारतीय तेल कंपनी ओएनजीसी को फरजाद स्थित गैस ब्लॉक में हिस्सेदारी देने की प्रक्रिया सुस्त कर दी है।
• अब माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच कुछ बीच का रास्ता निकल आया है तभी ईरान के राष्ट्रपति भारत यात्र पर आने को तैयार हुए हैं। भारतीय तेल कंपनियों ने इस बात के संकेत भी दिए हैं कि वे ईरान से ज्यादा तेल खरीदने को तैयार हैं। ऐसे में फरजाद-बी गैस ब्लॉक में भारतीय निवेश को भी हरी झंडी मिलने के संकेत हैं।
• रोहानी गुरुवार को दो दिवसीय दौरे पर भारत आएंगे।1भारत के लिए अमेरिकी ऊर्जा सचिव की आगामी यात्र भी बेहद अहम होगी। ट्रंप प्रशासन के कार्यकाल में दोनो देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को लेकर कोई व्यापक विमर्श नहीं हुआ है जबकि ओबामा प्रशासन के दौरान दोनों देशों ने इस क्षेत्र के लिए भारी भरकम एजेंडा बनाया था।
• हालांकि इस दौरान भारत ने अमेरिका से बड़े पैमाने पर ऊर्जा की खरीद शुरू कर दी है। सचिव रिक पेरी की यात्र के दौरान कोयला, आण्विक और हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में परस्पर सहयोग पर बात होगी।

विवादित दक्षिण चीन सागर

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• अमेरिकी रक्षा विभाग के मुख्यालय पेंटागन ने कांग्रेस को बताया है कि ‘‘भारत-प्रशांत क्षेत्र’ को अपने फायदे के लिहाज से पुन: व्यवस्थित करने के लिए चीन अपने पड़ोसियों पर दबाव बना रहा है।
• पेंटागन ने कहा, चीन की ओर से अपनी आर्थिक एवं सैन्य आक्रामकता बनाए रखने और दीर्घकालिक रणनीति के जरिए सत्ता का प्रभाव दिखाने के कारण यह एक ऐसा सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रम जारी रखेगा जो निकट भविष्य में भारत-प्रशांत क्षेत्रीय वर्चस्व और अमेरिका को विस्थापित करने की कोशिश करेगा ताकि भविष्य में वैश्विक प्रमुखता प्राप्त कर सके।
• वित्तीय वर्ष 2019 के लिए अपने वार्षिक रक्षा बजट में पेंटागन ने कहा, चीन सैन्य आधुनिकीकरण, प्रभाव डालने वाले अभियानों और आवामक अर्थशास्त्र का इस्तेमाल कर पडोसी देशों पर दबाव बना रहा है ताकि भारत-प्रशांत क्षेत्र को अपने फायदे में पुन:व्यवस्थित कर सके। चीन समूचे दक्षिण चीन सागर पर संप्रभुता का दावा करता है।
• वियतनाम, मलयेशिया, फिलीपींस, ब्रूनेई और ताइवान इसके उलट दावा करते हैं।पूर्वी चीन सागर में भी चीन का जापान के साथ क्षेत्रीय विवाद है। पेइचिंग ने कई द्वीपों और रीफों को बनाकर उन पर सैन्य नियंतण्र कायम कर लिया है। दोनों क्षेत्र खनिज, तेल एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों के मामले में समृद्ध माने जाते हैं।
• वैश्विक व्यापार के लिए भी वे अहम हैं।पेंटागन के मुताबिक, अमेरिकी समृद्धि और सुरक्षा के लिए प्रमुख चुनौती संशोधनवादी शक्तियों की दीर्घकालिक और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का फिर से उदय होना है। रक्षा विभाग ने कहा, यह स्पष्ट है कि चीन और रूस एक ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं जो उनके अधिनायकवादी मॉडल से मेल खाती है.

उज्ज्वला योजना

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• उज्ज्वला योजना के जरिए गरीबों के घर-घर तक पैठ बनाने में कामयाबी हासिल करने के बाद अब सरकार ने अति गरीबों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर दी है। गरीबों को नि:शुल्क एलपीजी कनेक्शन देने की मुहिम में शामिल अति गरीबों की सूची बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
• अबकी बार की उज्जवला में वनवासी से लेकर चाय बागान तक के परिवारों को एलपीजी कनेक्शन देना है। लिहाजा वन विभाग और चाय बागान बोर्ड आदि से ऐसे लाभार्थियों की सूची जुटाई जाएगी। इस प्रक्रिया में तेल वितरण कंपनियों को लगाया जाएगा। उधर, जिस तरह से एलपीजी कनेक्शनों को दूरदराज इलाकों में दिया जा रहा है वहां जल्दी सिलेंडर पहुंचाने के लिए नए वितरकों की नियुक्ति की जा रही है।
• केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की ओर से चलाई जा रही उज्जवला योजना में अब तक करीब साढ़े तीन करोड़ गरीबों को एलपीजी कनेक्शन दिए जा चुके हैं। करीब डेढ़ करोड़ एलपीजी कनेक्शन और दिए जाने हैं। यह वे लाभार्थी हैं जो कि बीपीएल श्रेणी में आते हैं और इनका आंकड़ा 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना के आधार पर लिया गया है। हालांकि सरकार ने यह पांच करोड़ एलपीजी कनेक्शन देने की संख्या में वृद्धि कर आठ करोड़ कर दिया है।
• नए तीन करोड़ एलपीजी कनेक्शन अति गरीबों को दिए जाने हैं, जो कि जंगलों और वन क्षेत्रों में आदि में काम करते हैं। लिहाजा उज्जवला के विस्तारित योजना में अनुसूचित जाति /अनुसूचित जनजाति परिवार, वनवासी, अत्यन्त पिछड़ा वर्ग, द्वीपों पर रहने वाले, चाय बगानों में रहने वालों तथा प्रधानमंत्री आवास योजना एवं अंत्योदय योजना के लाभार्थियों को शामिल किया गया है।

मालदीव में आपातकाल

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• मालदीव की संसद ने राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन की सिफारिशों को मंजूर करते हुए देश में आपातकाल की अवधि 30 दिन और बढ़ा दी। मालदीव की इंडिपेन्डेन्ट समाचार वेबसाइट की खबर में बताया गया है कि मतदान के लिए केवल 38 सांसद उपस्थित थे। आपातकाल की अवधि समाप्त होने से पहले ही मतदान हुआ।
• संविधान के मुताबिक, मतदान के लिए 43 सांसदों की जरूरत होने के बावजूद केवल 38 सांसदों ने मतदान कर दिया।वेबसाइट के अनुसार, सभी 38 सांसद सत्ताधारी दल के थे और उन्होंने आपातकाल की अवधि बढ़ाए जाने को मंजूरी दे दी। विपक्ष ने मतदान का बहिष्कार किया। अब देश में आपातकाल 22 मार्च को समाप्त होगा।
• विपक्षी सांसद इब्राहिम मोहम्मद सोलीह ने कहा, ऐसा कोई कानून नहीं है जिसमें लोगों के लिए आपातकाल की अवधि बढ़ाने का अनुपालन जरूरी हो। हम लोगों से बात कर रहे हैं। इससे अलग संविधान का उल्लंघन और कुछ नहीं हो सकता। एक अन्य विपक्षी सांसद इवा अब्दुल्ला ने आरोप लगाया कि स्पीकर ने संविधान की अनदेखी की। उन्होंने कहा कि आपातकाल अवैध है।

एवरी चाइल्ड 'अलाइव’ रिपोर्ट

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हाल ही में संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (United Nations Children’s Fund-Unicef) द्वारा ‘एवरी चाइल्ड अलाइव’ (Every Child Alive) नामक रिपोर्ट में नवजात मृत्यु दर पर देश वार रैंकिंग जारी की गई है।
नवजात मृत्यु दर को जन्म के पहले 28 दिनों (0-27 दिनों) के दौरान प्रति 1000 नवजातों पर होने वाली मौतों के रूप में परिभाषित किया जाता है।
रिपोर्ट में भारत को उन दस देशों की सूची में रखा गया है जहाँ पर सबसे ज़्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि नवजात बच्चे जीवित रह सकें। वहीं, नवजात बच्चों के जन्म के संदर्भ में पाकिस्तान सबसे ज़्यादा असुरक्षित देश है।
रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु
इस रिपोर्ट के मुताबिक कम आय वाले देशों में औसत नवजात शिशु मृत्यु दर उच्च आय वाले देशों की तुलना में नौ गुना ज़्यादा है। हालाँकि कई देशों का प्रदर्शन इस प्रवृत्ति के अनुरूप नहीं है। उदाहरण के लिये भारत की तरह कम-मध्यम आय अर्थव्यवस्थाओं के रूप में वर्गीकृत श्रीलंका और यूक्रेन में 2016 में नवजात मृत्यु दर लगभग 5/1000 थी।

अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन

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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रॉन सम्मेलन में वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) के महत्व को रेखांकित किया।निजी क्षेत्र के निवेश को आकर्षित करने के प्रयास में, संयुक्त गारंटी तंत्र को जगह दी जा रही है।
विश्वभर में सौर परियोजनाओं के लिए एक स्थायी वित्तपोषण वास्तुकला बनाने की रणनीति के तहत अंतरराष्ट्रीय सौर एलायंस 300 अरब डॉलर के जोखिम से बचाव निधि पर काम कर रहा है।
भारत ने कहा था कि आईएसए "सभी बहुपक्षीय विकास बैंकों को" समर्थन करने की योजना बना रहा है और तेजी से आईएसए इन विकास बैंकों से अपील करता है, यदि वे दुनिया भर में अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए अपने ऋण पोर्टफोलियो का एक खास प्रतिशत निर्धारित कर सकते हैं "।
यूरोपीय निवेश बैंक ने घोषणा की कि वह अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के लिए समर्थन के रूप में € 1 अरब प्रदान करेगा।

मोनोकल्चर वृक्षारोपण की नीति

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भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने सेटेलाइट चित्र को आधार बनाकर भारत के वन-क्षेत्र में 1 प्रतिशत की वृद्धि दिखाई है। यह पिछले दो वर्षों की तुलना में दर्ज की गई है। इस प्रकार के डिजीटल चित्र से हरित क्षेत्रों के अंदरुनी भागों की सच्चाई का पता नहीं चल पाता है। शताब्दी के अंत तक बेसलाइन कवर में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। फिर भी पुराने वनों की तुलना में पेड़ अभी भी कम हैं। व्यावसायिक उद्देश्य से उगाए गए पेड़ों को हम सामान्य वनों की गिनती में नहीं ले सकते। 1968 के चैम्पियन और सेथ वर्गीकरण के अनुसार भारत में 16 प्रकार के मुख्य और 221 प्रकार के अन्य वन हैं। परन्तु अंग्रेजों से पूर्व एवं अंग्रेजों के काल में भारत में इनका बहुत अधिक दोहन किए जाने से अब ये सीमित मात्रा में रह गए हैं। पर्यावरण मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में मिजोरम, नगालैंण्ड और अरुणाचल प्रदेश में लगभग 1200 वर्ग कि.मी. के वन क्षेत्र के नष्ट होने की बात कही है। देश के अन्य भागों में वृहद स्तर पर वनीकरण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। परन्तु ये कार्यक्रम उत्तरपूर्वी राज्यों की जैव-विविधता की वैश्विक छवि को पहुँची क्षति की भरपाई नहीं कर सकते। भारत को वनीकरण के कार्यक्रमों का पुनरावलोकन करके मोनोकल्चर वृक्षारोपण की नीति को बदलने की आवश्यकता है। इस क्षेत्र में वैज्ञानिक पहुँच की आवश्यकता है। हाल ही के एक आकलन में खुले वन क्षेत्र के रूप में 3,00,000 वर्ग कि.मी. के क्षेत्र की पहचान की गई है। इस क्षेत्र को विविध, स्वदेशी वृक्षों के रोपण के काम में लाया जा सकता है। उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के मूल्यवान वनों की रक्षा के लिए एक समर्पित प्रयास की आवश्यकता है

ई-काॅमर्स में बातचीत आगे बढ़ाना चाहता है अमेरिका

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• अमेरिका अब भारत पर ई-कामर्स को लेकर डब्ल्यूटीओ के प्लेटफार्म पर बातचीत चाहता है। इसकी वजह है कि एक बार भारत ई-कॉमर्स पर बातचीत शुरू कर देगा तो कुछ समझौते हो ही जाएंगे। डब्ल्यूटीओ विशेषज्ञ अश्विनी महाजन कहते हैं, एक बार ई-कॉमर्स को लेकर डब्ल्यूटीओ में नियम बन गए तो घरेलू नियम बेकार हो जाएंगे। अमेरिका यही चाहता है। क्योंकि तब विदेशी ई-कामर्स कंपनियां बिना शुल्क के भारत में सामान भेज पाएंगी और भारत का मेक इन इंडिया कार्यक्रम प्रभावित होगा।

भारत-रूस द्विपक्षीय व्यापार

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• भारत व रूस के बीच वर्ष 2025 तक द्विपक्षीय व्यापार 30 अरब डालर तक पहुंच जाएगा। दोनों देशों के बीच व्यापार को लेकर सामने आ रही समस्याओं को सुलझाने के लिए एक अंत: सरकारी समूह का गठन भी किया गया है।
• रूस के आर्थिक विकास मंत्री एलेक्सी ग्रुजदेव ने यह जानकारी दी।उद्योग व वाणिज्य संगठन फिक्की द्वारा सोमवार को आयोजित एक र्चचा के दौरान देश के उद्यमियों को संबोधित करते हुए रूस के आर्थिक विकास मंत्री एजेक्सी ग्रूजदेव ने द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने की रणनीति पर र्चचा की।
• उन्होंने कहा, वर्तमान में भारत व रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार 7.5 मिलियन डालर है जिसे 2025 तक 30 बिलियन डॉलर पहुंचाने का लक्ष्य है। उन्होंने बताया, दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश की बाधाओं की पहचान करने के लिए अंतर-सरकारी समूह के तहत एक विशेष समूह का गठन किया गया है।
• उन्होंने कहा, पिछले वर्ष व्यापार में हुई 21.5 फीसद वृद्धि को और बढ़ाने के लिए दोनों सरकारों द्वारा व्यापार में बाधाओं को दूर करने के लिए उच्च प्राथमिकता दी जाएगी। उन्होंने कहा, रूसी और भारतीय अर्थव्यवस्थाएं कृषि, मशीन निर्माण और ऊर्जा क्षेत्रों सहित कई क्षेत्रों में पूरक हैं।
• द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए यह ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर हम इस वर्ष ध्यान देंगे। उन्होंने कहा, स्टार्टअप कंपनियां तथा लघु उद्योग इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
• केंद्रीय विदेश मंत्रालय में इकनॉमी डिप्लोमैसी डिविजन के संयुक्त सचिव विनोद जैकब ने कहा, द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए भारतीय राज्यों व रूसी क्षेत्रों में आपसी सामंजस्य, कनेंक्टीविटी मे साथ साथ ऊर्जा क्षेत्र रक्षा, सुरक्षा के साथ साथ उच्च तकनीकी सहयोग की जरूरत है।

दुनिया के सबसे निर्धन देश

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सोमालिया (अंग्रेज़ी: Somalia) अफ़्रीका के पूर्वी किनारे पर स्थित एक देश है, जिसे पूर्व में सोमाली लोकतांत्रिक गणराज्य के नाम से जाना जाता था। इसके उत्तर-पश्चिम में जिबूती, दक्षिण पश्चिम में केन्या, उत्तर में अदन की खाड़ी, पूर्व में हिन्द महासागर और पश्चिम में इथियोपिया स्थित है।
आधिकारिक तौर पर संघीय गणराज्य सोमालिया को पूर्व में सोमाली लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में जाना जाता है। प्राचीन काल में सोमालिया बाकी दुनिया के साथ वाणिज्य के लिए एक महत्त्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था। इसके नाविक और व्यापारी लोबान, मसाले और उन तमाम वस्तुओं के मुख्य आपूर्तिकर्ता थे, जिन्हें प्राचीन मिस्री, फोनिशियाई, मेसेनिशियाई और बेबिलोन निवासियों द्वारा मूल्यवान माना जाता था। विद्वानों के अनुसार सोमालिया वह स्थान भी था, जहाँ पुन्त का प्राचीन राज्य स्थित था। प्राचीन पुन्तितेस ऐसे लोगों का देश था, जिनका प्राचीन मिस्र के साथ राजा फारोह सहुरे और रानी हत्शेपसट के दौर में घनिष्ठ संबंध था। सोमालिया के आसपास बिछी हुई पिरामिड संरचनाएं, मंदिर और तराशी हए पत्थर के प्राचीन घर इस अवधि के माने जाते हैं।

भारत और अफगानिस्तान के बीच सहयोग

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केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने स्वास्थ्य मंत्रालय के भारतीय खाद्य सुरक्षा तथा मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) तथा अफगानिस्तान के कृषि, सिचाई और पशुधन मंत्रालय के बीच खाद्य सुरक्षा और संबंधित क्षेत्रों के लिए सहयोग व्यवस्था पर हस्ताक्षर को स्वीकृति दे दी है.
सहयोग के क्षेत्रों में हित के चिन्हित विषयों, विशेष रूप से आयात प्रक्रियाओं, गुणवत्ता नियंत्रण संचालन, सैम्पलिंग, जांच, पैकेजिंग तथा लेबलिंग, पर तकनीकी आदान-प्रदान में सहायता करना है. समझौते में शामिल पक्षों की जिम्मेदारियों के अंतर्गत हित के अन्य विषय जिसे पारस्परिक तौर पर निर्धारित किया जाएगा.
सहयोग व्यवस्था सूचना साझा करने, प्रशिक्षण तथा क्षमता सृजन उपायों तथा खाद्य सुरक्षा प्रणाली में सुधार के लिए एक दूसरे के श्रेष्ठ व्यवहारों को जानने में सहायक होगी.

लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ कराने की सिफारिश

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एक श्वेत पत्र मसौदा जारी कर विधि आयोग ने लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ कराने की सिफारिश की गई है। पूर्व सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीएस चौहान की अध्यक्षता में विधि आयोग ने इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की राय लेने का फैसला किया है।
मुख्य तथ्य
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ कराने से राजनीतिक स्थिरता आएगी क्योंकि किसी राज्य में अगर कार्यकाल खत्म होने के पहले भी कोई सरकार गिर जाती है या फिर चुनाव के बाद किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता तो वहां आनन-फानन में नहीं बल्कि पहले से तय समय पर ही चुनाव होगा। इससे राजनीतिक स्थिरता बनी रहेगी।
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जा रहा है कि इससे चुनावी खर्च में काफी बचत होगी। केंद्र सरकार की ओर से यह कहा जा रहा है कि दोनों चुनाव एक साथ कराने से तकरीबन 4,500 करोड़ रुपये की बचत होगी।
विधि आयोग की प्रमुख सिफारिशें
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 और लोकसभा तथा विधानसभाओं के नियमों में संशोधन करके देश में 2019 में लोकसभा के साथ समकालिक चुनावों में विधायकों का चुनाव एक साथ मिलकर किया जा सकता है। 2024 में शेष राज्यों का चुनाव होने वाले आम चुनाव के साथ किया जा सकता है।
आयोग के अनुसार नई लोकसभा या विधानसभा मध्यावधि चुनाव के मामले में केवल पिछली लोकसभा/विधानसभा की शेष अवधि के लिये ही सेवा करेगी, न कि पाँच साल की अवधि के लिये।
केंद्र को आयोग के अनुसार संविधान में संशोधन करना चाहिये, यदि सहमति हो, तो सभी राज्यों द्वारा इसकी पुष्टि होनी चाहिये ताकि किसी भी चुनौती से बचा जा सके

डब्ल्यूएचओ ने अपनी पहली आवश्यक डायग्नोस्टिक सूची प्रकाशित की

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कई लोग बीमारियों के लिए परीक्षण करने में असमर्थ हैं क्योंकि वे नैदानिक ​​सेवाओं तक नहीं पहुंच सकते हैं। कई गलत तरीके से निदान किए जाते हैं। नतीजतन, उन्हें आवश्यक उपचार नहीं मिलता है और, कुछ मामलों में, वास्तव में गलत उपचार हो जाता है।
उदाहरण के लिए, दुनिया भर में टाइप 2 मधुमेह वाले अनुमानित 46% वयस्कों को अनियंत्रित किया जाता है, गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं और उच्च स्वास्थ्य लागतों का जोखिम होता है। एचआईवी और तपेदिक जैसी संक्रामक बीमारियों के देर से निदान फैलाने का जोखिम बढ़ाता है और उन्हें इलाज के लिए और अधिक कठिन बनाता है।
इस अंतर को दूर करने के लिए, डब्ल्यूएचओ ने अपनी पहली आवश्यक डायग्नोस्टिक्स सूची प्रकाशित की, जो कि सबसे सामान्य स्थितियों के साथ-साथ कई वैश्विक प्राथमिकता रोगों का निदान करने के लिए आवश्यक परीक्षणों की एक सूची है।
डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ टेड्रोस अधानोम गेबेरियसस कहते हैं, "एक सटीक निदान प्रभावी उपचार पाने का पहला कदम है।" "डायग्नोस्टिक सेवाओं की कमी के कारण किसी को भी पीड़ित या मरना नहीं चाहिए, या क्योंकि सही परीक्षण उपलब्ध नहीं थे।"
सूची इन विट्रो परीक्षणों पर केंद्रित है - यानी रक्त और मूत्र जैसे मानव नमूनों के परीक्षण। इसमें 113 उत्पाद हैं: 58 परीक्षण सामान्य स्थितियों की एक विस्तृत श्रृंखला का पता लगाने और निदान के लिए सूचीबद्ध हैं, जो आवश्यक पैकेज प्रदान करते हैं जो रोगियों की स्क्रीनिंग और प्रबंधन के लिए आधार बना सकते हैं। शेष 55 परीक्षण एचआईवी, तपेदिक, मलेरिया, हेपेटाइटिस बी और सी, मानव पेपिलोमावायरस और सिफलिस जैसी "प्राथमिकता" बीमारियों की पहचान, निदान और निगरानी के लिए तैयार किए गए हैं।

बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना

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भारत में इस समय लगभग 4900 बड़े बांध हैं और लगभग 350 बांध निर्माणाधीन हैं। इसके अतिरिक्त कई हजार छोटे बांध हैं। ये बांध देश की जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है। इनकी संपत्ति प्रबंधन एवं सुरक्षा के मामले में एक प्रमुख जिम्मेदारी बनती है। अप्रैल 2012 में केंद्रीय जल आयोग (सी.डब्ल्यू.सी.) ने विश्व बैंक की आर्थिक सहायता से एक छः वर्षीय बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना (ड्रिप) 2100 करोड़ रू. की अनुमानित लागत से शुरू की। इस परियोजना में मूल रूप से चार राज्यों केरल, मध्य प्रदेश, उडीसा और तमिलनाडु के 223 बांधों को पुनर्वास और सुधार परियोजना के अंतर्गत लाना था। बाद में कर्नाटक, उत्तराखंड़ (यू.जे.वी.एन.एल.) एवं झारखंड़ (डी.वी.सी.) राज्यों के जुड़ने के बाद कुल ड्रिप बांधों की संख्या 250 हो गई है। यह परियोजना नई तकनीकियों को बढ़ावा देने और केन्द्र एवं राज्य स्तरों पर बांध सुरक्षा मूल्यांकन और कार्यान्वयन तथा देश के कुछ प्रमुख शैक्षणिक और अनुसंसाधन संस्थानों में बांध सुरक्षा संस्थागत सामर्थ्य में सुधार लाना है। केन्द्रीय जल आयोग का केन्द्रीय बांध सुरक्षा संगठन, एक अभियांत्रिकी और प्रबंधन परामर्श संस्था के सहयोग से परियोजना के समन्वय एवं कार्यान्वयन को रूप दे रहा है।

 

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